“जनरल खंडूरी – एक सिपाही, एक संदेश” अनुशासन की आखिरी सलामी

संयुक्त नागरिक संगठन के मार्गदर्शक अर्जुन कोहली (सेवानिवृत शिक्षक एवं सोशल एक्टिविस्ट) की कलम से स्वरचित श्रद्धांजलि कविता "जनरल खंडूरी - एक सिपाही, एक संदेश" अनुशासन की आखिरी सलामी

1:- वो वर्दी उतार कर आया था, पर अनुशासन उतार न पाया था। 36 साल सरहद सींची थी, फिर कुर्सी को भी सीमा बनाया था। बोफोर्स की तोपें देखी थीं, फिर कलम से घोटाले दागे थे। जिस फौजी ने दुश्मन कंपाए थे, उसने कुर्सी के गद्दार भगाए थे।
“काम नहीं तो दाम नहीं” का नारा देकर, बाबुओं की नींद उड़ा दी थी। “नोट अप्रूव्ड” की आदत छुड़ाकर, फाइलों को पंख लगा दिए थे।लोकायुक्त की कलम से उसने, भ्रष्टाचार का चेहरा काला किया। अन्ना भी बोले – “ऐसा कानून”, पहाड़ के जनरल ने कमाल किया।
आपदा में जब पहाड़ रोया था, एसडीआरएफ बनाकर हाथ बढ़ाया था। केदार की चीख सुनी थी उसने, तब सेना से पहले राहत पहुंचाया था।ऑल वेदर रोड का सपना देख, चारधाम को बारहमासी बनाया था। बोला था – * _”भगवान के घर का रास्ता, बरसात के भरोसे क्यों छोड़ा जाए?”।

2:- ट्रांसफर में जब दलाली चलती थी, ऑनलाइन सिस्टम से ताला लगाया था। कहता था – “राजनीति दुकान नहीं”, “लाइफटाइम कमिटमेंट” सिखाया था।
विप की लाल बत्ती उतार कर, सादगी को अपना ब्रांड बनाया था। काफिला रोककर जाम खुलवाते थे, जनता का जनरल कहलाया था।
5 बार संसद, 2 बार सीएम बनकर भी, आ फॉर आदर्श ही कहलाया था। दिल्ली की सत्ता, दून की ममता, दोनों जगह ईमान निभाया था।वर्दी उतरी, वचन नहीं उतरा, दल बदला जा सकता है, देश नहीं। हे अनुशासन के सरदार, तुम्हें सलाम, तुम “बेटर अप्रूव्ड” थे, “बेटर अप्रूव्ड” ही रहोगे।
19 मई 2026 का दिन जब वो चला गया, पर छोड़ गया एक संकल्प हमारा। “जनरल का अनुशासन” जब “प्रशासन का संस्कार” बनेगा, तभी बनेगा विकसित उत्तराखंड हमारा। तभी बनेगा विकसित भारत हमारा।आज देहरादून मौन खड़ा है, संयुक नागरिक संगठन नमन कर रहा है। थापा, बहल, त्यागी, कोहली सब कहते हैं, “खंडूड़ी इज किंग” – अमर कह रहा है।

3:- शव पर फूल चढ़ाने वालो आज ये संकल्प लो सता में रह कर ईमानदारी और अनुशासन से ही जनकल्याण करेंगे शव पर फूल चढ़ाने वालो, फूल नहीं, फर्ज चढ़ाओ ज़रा एक पल रुक जाना। माला पहनाने से पहले, खुद से ये सवाल कर जाना।
क्या जनरल की ईमानदारी अपनी कुर्सी पर लाओगे? “नोट अप्रूव्ड” की संस्कृति छोड़, “सेम डे अप्रूव्ड” बन जाओगे?क्या मेहनत उसकी ओढ़ोगे, जो 36 साल सीमा पर डटा रहा? एसी कमरे से निकल कर, गांव-गांव, बर्फ में भी गया रहा?
क्या अनुशासन वो धारोगे, जो विप कल्चर तोड़ गया? लाल बत्ती उतार कर खुद, जाम में जनता संग खड़ा हो गया?
लोकायुक्त बनाया था उसने, खुद पर भी लागू किया था। क्या तुम भी अपना गिरेबान, जनता के आगे खोल सकोगे?
एसडीआरएफ बनाई आपदा में, ऑल वेदर रोड का सपना देखा। क्या तुम भी कुर्सी से उतर, पहाड़ का दर्द देख सकोगे?

4:- राजनीति दुकान नहीं कहा था, लाइफटाइम कमिटमेंट माना था। क्या तुम भी 5 साल का ठेका छोड़, उम्र भर देश को जानोगे?फूल तो मुरझा जाएंगे कल, मालाएं सूख जाएंगी। पर आ फॉर आदर्शबन जाओ, तो यही सच्ची श्रद्धांजलि कहलाएंगी।
वरना ये पुष्पांजलि भी, एक रस्म-अदायगी रह जाएगी जनरल की आत्मा पूछेगी मेरे जैसा बनकर दिखाओ, तब मानूंगा
शव पर फूल ही नहीं, संकल्प भी चढ़ाएंगे, तेरे हर कानून को लागू कराएंगे। जब तक पहाड़ जिंदा है, याद रखेगा, एक फौजी सीएम भी हुआ करता था।
तो नेता जी हाथ जोड़कर विनती है, श्रद्धांजलि का मान रखना। फूल नहीं, फर्ज चढ़ाओ खंडूरी बनकर दिखाओ, तभी आना।
जय हिंद। जय अनुशासन। विनम्र श्रद्धांजलि तभी सच्ची होती है, जब कर्म खंडूरी के समान हो।

अर्जुन कोहली सेवानिवृत्त शिक्षक सोशल एक्टिविस्ट सदस्य,संयुक्त नागरिक संगठन, देहरादून

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